Decoding Kumar Vishwas: आखिर "कॉकरोच" वाले बयान में छिपा संदेश क्या था?
सामान्यतः ऐसी टिप्पणियाँ सोशल मीडिया पर कुछ घंटों के लिए चर्चा का विषय बनती हैं और फिर किसी नए विवाद के नीचे दब जाती हैं। लेकिन यदि आप डॉ. कुमार विश्वास के भाषणों और वक्तव्यों को ध्यान से सुनते हैं, तो आप जानते हैं कि वे अक्सर सीधे नहीं, बल्कि प्रतीकों के माध्यम से संवाद करते हैं। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि उन्होंने "कॉकरोच" शब्द का प्रयोग क्यों किया, बल्कि वास्तविक प्रश्न यह है कि वे उस प्रतीक के माध्यम से हमें किस खतरे के प्रति सावधान कर रहे थे।
आज हम उसी कथन को डिकोड करने की कोशिश करेंगे।
भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। यहाँ विरोध का अधिकार है, असहमति का अधिकार है, सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार है। यही हमारी लोकतांत्रिक शक्ति है। यदि युवाओं को किसी परीक्षा प्रणाली से शिकायत है, यदि किसी नीति को लेकर असहमति है, यदि किसी निर्णय पर सवाल हैं, तो उन सवालों को उठाया जाना चाहिए। लेकिन असहमति होने पर लोकतांत्रिक विरोध और अराजकता के बीच एक बहुत पतली रेखा होती है।
विरोध तब तक लोकतांत्रिक है जब तक उसका उद्देश्य सुधार हो। लेकिन जब विरोध का उद्देश्य केवल व्यवस्था के प्रति घृणा पैदा करना, समाज में अविश्वास फैलाना और हर संस्था को संदेह के घेरे में खड़ा करना बन जाए, तब वह लोकतांत्रिक अधिकार से आगे बढ़कर एक खतरनाक प्रवृत्ति का रूप लेने लगता है। यही वह बिंदु है जिसकी ओर डॉ. कुमार विश्वास संकेत कर रहे थे।
इतिहास हमें बताता है कि किसी भी राष्ट्र को केवल बाहरी शत्रुओं से खतरा नहीं होता। कई बार राष्ट्र भीतर से टूटते हैं। पहले लोगों का अपनी संस्थाओं से विश्वास उठाया जाता है, फिर समाज को विभिन्न समूहों में बाँटा जाता है, फिर हर उपलब्धि को संदेह के घेरे में खड़ा किया जाता है और अंततः ऐसी मानसिकता पैदा की जाती है जिसमें नागरिक अपने ही राष्ट्र को समस्या मानने लगते हैं।
भारत आज विश्व की सबसे तेजी से उभरती हुई शक्तियों में से एक है। आर्थिक मोर्चे पर उसकी स्थिति मजबूत हो रही है। डिजिटल क्रांति ने करोड़ों लोगों को नई संभावनाएँ दी हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली हुई है। स्वाभाविक है कि एक उभरता हुआ और आत्मविश्वासी भारत सभी को समान रूप से अच्छा नहीं लगेगा।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भारत की आलोचना करना भारत-विरोध नहीं है। सरकारों की आलोचना करना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब किसी भी विषय पर केवल नकारात्मकता परोसी जाए, जब युवाओं के मन में यह विश्वास भर दिया जाए कि देश की हर संस्था विफल है, जब समाधान की जगह केवल क्रोध दिया जाए, तब हमें सावधान हो जाना चाहिए। क्योंकि क्रोधित समाज का नेतृत्व करना आसान होता है, लेकिन जागरूक समाज को भ्रमित करना कठिन होता है।
आज सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ लोग देश से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी भारत के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। उनमें से कई ईमानदारी से अपनी राय रखते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी पूरी राजनीति या लोकप्रियता असंतोष पैदा करने पर आधारित होती है। उनका उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि निरंतर उत्तेजना बनाए रखना होता है। वे हर घटना को संकट और हर समस्या को व्यवस्था के पूर्ण पतन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यहीं पर युवाओं को सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।
भारत को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो प्रश्न पूछें, लेकिन पढ़ें भी। जो असहमति रखें, लेकिन तथ्यों को समझें भी। जो विरोध करें, लेकिन समाधान खोजने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करें। राष्ट्र निर्माण केवल नारों से नहीं होता; उसके लिए धैर्य, अध्ययन, अनुशासन और दीर्घकालिक दृष्टि की आवश्यकता होती है।
डॉ. कुमार विश्वास का "कॉकरोच" वाला बयान किसी व्यक्ति या संगठन पर टिप्पणी से अधिक एक चेतावनी था। एक ऐसी चेतावनी, जो हमें यह याद दिलाती है कि विरोध आवश्यक है, लेकिन अराजकता नहीं। असहमति आवश्यक है, लेकिन विघटन नहीं। परिवर्तन आवश्यक है, लेकिन ऐसा परिवर्तन जो राष्ट्र को मजबूत बनाए, कमजोर नहीं।
क्योंकि अंततः किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके नागरिकों का विश्वास होता है। और जो शक्तियाँ उस विश्वास को तोड़ना चाहती हैं, वे चाहे किसी भी विचारधारा, संगठन या मंच से आती हों, उनसे सावधान रहना ही बुद्धिमानी है।
यही वह संदेश है जो डॉ. कुमार विश्वास अपने व्यंग्य और प्रतीकों के माध्यम से हमें समझाना चाहते थे।
भारत जैसा विशाल, विविधतापूर्ण और तेजी से उभरता हुआ राष्ट्र स्वाभाविक रूप से वैश्विक ध्यान का केंद्र है। जब कोई देश आर्थिक, तकनीकी और सामरिक रूप से मजबूत होता है, तब उसके विरोधी केवल उसकी सीमाओं को नहीं देखते, बल्कि उसके सामाजिक ताने-बाने को भी निशाना बनाने का प्रयास करते हैं। उनका लक्ष्य यह नहीं होता कि वे सीधे भारत को हरा दें; उनका लक्ष्य यह होता है कि भारतीय स्वयं एक-दूसरे पर अविश्वास करने लगें। ऐसी शक्तियाँ चाहती हैं कि युवा अपने विवेक से अधिक अपने क्रोध से संचालित हों। वे चाहती हैं कि हर मुद्दा संवाद का नहीं, संघर्ष का विषय बने। वे चाहती हैं कि नागरिकों का विश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक प्रक्रियाओं और राष्ट्रीय एकता से धीरे-धीरे कम हो जाए।
यही कारण है कि किसी भी जागरूक नागरिक के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि कौन क्या कह रहा है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह समझना है कि किसी कथन, आंदोलन या अभियान का अंतिम परिणाम क्या होगा। क्या वह समाज को जोड़ रहा है या तोड़ रहा है? क्या वह समाधान की ओर ले जा रहा है या केवल असंतोष बढ़ा रहा है?
डॉ. कुमार विश्वास के वक्तव्य को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। उनका संकेत उन प्रवृत्तियों की ओर था जो युवाओं की ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण के बजाय राष्ट्र के प्रति निरंतर अविश्वास में बदल देना चाहती हैं।
भारत को आज ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो सजग हों, लेकिन उत्तेजित नहीं; जो प्रश्न पूछें, लेकिन भ्रमित न हों; जो असहमति रखें, लेकिन अपने राष्ट्र की एकता और स्थिरता के महत्व को भी समझें। क्योंकि अंततः बाहरी शक्तियाँ किसी राष्ट्र को उतना नुकसान नहीं पहुँचा सकतीं, जितना नुकसान उस राष्ट्र के भीतर पैदा हुआ अविश्वास पहुँचा सकता है।

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